मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल, निर्णय सुरक्षित

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से गुरुवार को कई महत्वपूर्ण प्रश्न किए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग को केवल स्वतंत्र होकर कार्य करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी स्वतंत्रता जनता को स्पष्ट रूप से दिखाई भी देनी चाहिए।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक तथा लोकपाल के चयन में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को चयन समिति का सदस्य बनाया जाता है, तो लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों में शामिल मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखने का क्या औचित्य है।

पीठ ने कहा कि यह किसी व्यक्ति या पद पर अविश्वास का विषय नहीं है, बल्कि निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जैसे न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखाई देना चाहिए, उसी प्रकार निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की उस याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया, जिसमें इस मामले को संविधान पीठ के समक्ष भेजने की मांग की गई है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद इस विषय में कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की जाएगी।

इसके बाद संसद ने वर्ष 2023 में नया कानून पारित किया, जिसके तहत चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। वर्तमान व्यवस्था में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। इसी कानून की संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि न्यायालय यह मानकर नहीं चल सकता कि प्रधानमंत्री अनुचित कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की अपनी गरिमा और विश्वसनीयता है तथा जनता को उस पर विश्वास होना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि मंत्रिपरिषद के गठन में न्यायिक सलाह आवश्यक नहीं है, तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति में इसकी आवश्यकता क्यों हो।

वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसकी विधायी प्राथमिकता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता तथा संसद के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायणन एवं अन्य याचिकाकर्ताओं ने सरकार की मांग का विरोध करते हुए कहा कि लगभग 20 दिनों तक विस्तृत सुनवाई के बाद मामले को संविधान पीठ के पास भेजने का अनुरोध किया गया है, जो उचित नहीं है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। अब न्यायालय यह तय करेगा कि इस मामले को संविधान पीठ के समक्ष भेजा जाएगा या वर्तमान पीठ ही इस पर अंतिम निर्णय सुनाएगी।

ZahidMansori
Author: ZahidMansori

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